पतझड़ में शाखों से टूटा पत्ता दबी हुई मगर मजबूत आवाज़ में कराह तो रहा ही है,
ख़ामोशी साफ-साफ कह रही है कि कभी ये भी झूमा करता था |
निर्दयी हवाओं और कठोर धुप से पहले ये भी गुनगुनाया करता था ,
ये आज भी गुनगुनाता है पर बस आवाज़ नहीं होती ,मालूम नहीं पड़ता ,
खामोश पत्ता तेज हवाओ में करकश आवाज़े करके ये प्रमाण दिया करता है कि
दुनिया अनजान सही पर कुछ जान अभी बाकी है,कुछ जान अभी बाकी है !!!
No comments:
Post a Comment