Friday, January 17, 2014

काली स्याही - उजला दिन


रातों की काली स्याही को 
हर उजले दिन पर घिसता हूँ,
बेखबरइस आपाधापी में
हर रोज कविता करता हूँ ,
हर रोज कविता करता हूँ ...

जा बैठा जो तट के निकट
अन्तर्मन को ये आभास हुआ,
नदी की धार में ' शोर ' नहीं 
मैं ख़ामोशी ढूंढा करता हूँ .…
बेखबरइस आपाधापी में
हर रोज कविता करता हूँ...  


मंजिल चाहने वाले कितने यूँ 
राह देख गुमराह हुए 
चमक धमक में दुनिया की 
कितने साधू शैतान हुए  

ये क्षण भंगुर संसार है मित्र 
इस चकाचौंध पर गुरुर ना कर,
कल राहें दिखलाता था मैं भी 
आज खुद खो जाया करता हूँ.…

बेखबरइस आपाधापी में
हर रोज कविता करता हूँ...  

रातों की काली स्याही को 
हर उजले दिन पर घिसता हूँ,
बेखबरइस आपाधापी में
हर रोज कविता करता हूँ , मैं हर रोज कविता करता हूँ ​


- कुमार ध्रुव 

Tuesday, December 18, 2012

कारवां गुजर गया


-गोपालदास "नीरज"

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
ग़ाज एक वह गिरी,
पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी,
और हम अजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

Friday, January 27, 2012

राहें !!!

अब तक अँधेरे के डर से कदम नहीं बढाये थे 
जब चलना शुरू किया तो जाना, राहों में रोशनी ही रोशनी बिछी है .....

Monday, August 1, 2011

रेलगाड़ी


छुक छुक आती रेलगाड़ी
छुक छुक जाती रेलगाड़ी
बड़ी लगन से एक राह में बदती जाती रेलगाड़ी
सर्दी गर्मी आंधी तूफान
एक दिशा में चलती रहती
मंजिल पाने को जो बढती
रुके रुकाये भी ना रूकती
पर जब मंजिल पा जाती वो
छुक छुक करती बढ जाती वो
पाना जो है अगली मंजिल
पाना जो है अगली मंजिल

Sunday, January 23, 2011

शायद ये राह सुबह को जाती हो.........


हम हमेशा की तरह बस चले जा रहे थे, शायद ये राह सुबह को जाती हो.........
वैसे ये पहली बार नहीं था की हम यू ही रात में सुनसान रास्ते नाप रहे थे ,लेकिन इस बार हम चलने के साथ सोच भी रहे थे| शाम को खाने के बाद हम यू ही कभी कभी इस राह पर निकल लिया करते है , दोस्ती सी हो गयी है इन बेजान रास्तो, पेड़ो, पत्थरो से | अब तो ये भी पहचान जाते है कि आज हम किसी सफलता की ख़ुशी में टहल रहे है या फिर अपनी असफलता और कल नयी दौड़ शुरू करने के बीच का महत्वपूर्ण समय स्वयं के साथ व्यतीत करने| इन्सान मौन रहकर खुद से कितना कुछ कह जाता है|पर कभी हमने अपनी इस आदत पर इतना ध्यान नहीं दिया , सच कहे तो ये एक तरीका था सच्चाई से भागने का | मात्र एक बहाना, असल जीवन की कटु सच्चाइयो से दूर भागने और बाहरी दुनिया से क्षण भर के लिए बगावत कर लेने का| शायद इसीलिए अकेले टहलने की इस आदत का राज जानकर भी आज कदम नहीं रुके और हम हमेशा की तरह बस चले जा रहे थे, शायद ये राह सुबह को जाती हो.........

Monday, July 5, 2010

छप छपा छप................


मुंबई और बारिश ...जितना कहे उतना कम है । बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है ।पर आज की बारिश की तो बात ही कुछ और थी। हम भीगते हुए अपने होस्टल को लौट रहे थे, अचानक बारिश तेज हो गयी , पेरों से वही छप छपा छप की आवाज़ आ रही थी और हम बस चले जा रहे थे |
हमारे यहाँ बारिश मुंबई जितनी तो नहीं होती पर जितनी भी होती है उसके हम खूब लुत्फ़ उठाया करते ।बात चाहे बारिश में नहाने की हो या गरमा गरम पकोड़ो की ,एक बारिश भी व्यर्थ ना जाया करती | गरम मूंगफली, भुट्टे या फिर मसालेदार चाय हर चीज़ का अपना एक अलग आनंद था |
हम स्कूल से जानबूच कर भीगते हुए घर आया करते थे | तेज़ साइकिल चलाने पर जब बारिश की बूंदे चेहरे से टकराती थी तो लगता था मानो हम किसी समंदर के किनारे खड़े हो| वो बात और है कि तब तक समंदर बस टी वी पर देखा था |हम अपनी पूरी पलटन के साथ एक के बाद एक सड़क के सारे गड्डो का पानी साइकिल के पहियों से चीरते चले जाते | सड़क पर बस हमारी साइकले ही लहराया करती थी| रास्ते में पानी से भरा एक गड्डा भी हमारी साइकिल के पहियों से अछूता ना रहता | लगता था मानो हम बादशाह और दुनिया गुलाम |
घर पहुचते तो भी बारिश का भूत सर से ना उतरता | हाथ में बाल्टी और तन पर बस चड्डी पहने हम निकल जाया करते पानी इकट्ठा करने के अपने अभियान पर , मानो जल संरक्षण की कोई नयी सरकारी योजना हो | ना लोगो की शर्म , ना सर्दी का डर| बस हम , हमारी बाल्टी और छत के नाले से गिरता पानी| तेज़ बारिश हो तो २-३ ड्रम आम बात थी| दादी आवाज़े लगे करती और हम मनमानी किया करते | इस तरह वो अपना धरम निभा लिया करती और हम अपना | परस्पर तालमेल का इससे बेहतर उदाहरण तो पूरे इतिहास में ना मिले |
पर अगर गलती से कहीं पिताजी दिन में दूकान से घर आ जाये तो हमारी खेर ना थी | नंगे बदन पर जब पड़ती थी तो बारिश में भी पसीने आ जाया करते थे | और ये समय होता था दादी की शिकायतों का , हमारी शरारतो का क्या खूब बदला लिया करती थी | पर दादी कि किस्मत इतनी अच्छी कहाँ , पिताजी तेज बारिश में दूकान से घर कम ही आया करते थे | गणित कि भाषा में कहे तो प्रोबबिलिटी शुन्य के बराबर ..............
अन्यथा हम अपना २-३ घंटो का आनंद कार्यक्रम तो दादी के हाथ के खाने के बाद ही संपन्न किया करते |शाम को छोटी बहिन स्कूल से आ जाती और उसके कुछ देर बाद ही माँ भी | फिर बनती थी गरमा गरम चाय और अगर किस्मत से माँ ज्यादा थकी ना हो और घर में सारे ताम झाम उपलब्ध हो तो माँ के हाथ के पकोड़ो के बिना शाम ना गुजरती | तब तक सामने वाले मैदान में कीचड़ खेल शुरू हो जाया करता , कबड्डी , खो-खो , सितोलिया और ना जाने क्या क्या , हर दिन एक नया खेल शुरू तो होता पर सबको कीचड़ में लथपथ किये बिना कोई खेल ख़त्म ना होता | बारिश थमते ही हम घर से निकलते और पानी में छप छपा छप करते हुए सीधे मैदान की ओर दौड़ लिया करते |
हम ये सब सोचते जा रहे थे और इधर बारिश और तेज़ होती जा रही थी | पर अब बात कुछ और थी, बारिश के साथ साथ हमारी चल भी तेज़ हो चुकी थी और आज फिर साथ चल रहे मित्रो कि परवाह किये बगेर हम बस दौड़ने लगे | वक़्त जैसे रुक सा गया था या सही शब्दों में कहे तो पीछे लौट रहा था और हम अब एक अलग दुनिया में थे | आई आई टी की सड़क पर बारिश में दौड़ना अपने आप में एक नया अनुभव था पर हमारे लिए तो कुछ भी नया ना था | सबकुछ शांत सा हो गया था और ठंडी हवा हमसे रफ़्तार मिला रही थी | सामने वाली सड़क मैदान लगने लगी थी और कुछ सुनाई दे रहा था तो बस वही बरसो पुरानी ' छप छपा छप'...'छप छपा छप'......................

Sunday, May 2, 2010

कुछ जान अभी बाकी है

पतझड़ में शाखों से टूटा पत्ता दबी हुई मगर मजबूत आवाज़ में कराह तो रहा ही है,
ख़ामोशी साफ-साफ कह रही है कि कभी ये भी झूमा करता था |
निर्दयी हवाओं और कठोर धुप से पहले ये भी गुनगुनाया करता था ,
ये आज भी गुनगुनाता है पर बस आवाज़ नहीं होती ,मालूम नहीं पड़ता ,
खामोश पत्ता तेज हवाओ में करकश आवाज़े करके ये प्रमाण दिया करता है कि
दुनिया अनजान सही पर कुछ जान अभी बाकी है,कुछ जान अभी बाकी है !!!