Sunday, January 23, 2011

शायद ये राह सुबह को जाती हो.........


हम हमेशा की तरह बस चले जा रहे थे, शायद ये राह सुबह को जाती हो.........
वैसे ये पहली बार नहीं था की हम यू ही रात में सुनसान रास्ते नाप रहे थे ,लेकिन इस बार हम चलने के साथ सोच भी रहे थे| शाम को खाने के बाद हम यू ही कभी कभी इस राह पर निकल लिया करते है , दोस्ती सी हो गयी है इन बेजान रास्तो, पेड़ो, पत्थरो से | अब तो ये भी पहचान जाते है कि आज हम किसी सफलता की ख़ुशी में टहल रहे है या फिर अपनी असफलता और कल नयी दौड़ शुरू करने के बीच का महत्वपूर्ण समय स्वयं के साथ व्यतीत करने| इन्सान मौन रहकर खुद से कितना कुछ कह जाता है|पर कभी हमने अपनी इस आदत पर इतना ध्यान नहीं दिया , सच कहे तो ये एक तरीका था सच्चाई से भागने का | मात्र एक बहाना, असल जीवन की कटु सच्चाइयो से दूर भागने और बाहरी दुनिया से क्षण भर के लिए बगावत कर लेने का| शायद इसीलिए अकेले टहलने की इस आदत का राज जानकर भी आज कदम नहीं रुके और हम हमेशा की तरह बस चले जा रहे थे, शायद ये राह सुबह को जाती हो.........