Friday, January 17, 2014

काली स्याही - उजला दिन


रातों की काली स्याही को 
हर उजले दिन पर घिसता हूँ,
बेखबरइस आपाधापी में
हर रोज कविता करता हूँ ,
हर रोज कविता करता हूँ ...

जा बैठा जो तट के निकट
अन्तर्मन को ये आभास हुआ,
नदी की धार में ' शोर ' नहीं 
मैं ख़ामोशी ढूंढा करता हूँ .…
बेखबरइस आपाधापी में
हर रोज कविता करता हूँ...  


मंजिल चाहने वाले कितने यूँ 
राह देख गुमराह हुए 
चमक धमक में दुनिया की 
कितने साधू शैतान हुए  

ये क्षण भंगुर संसार है मित्र 
इस चकाचौंध पर गुरुर ना कर,
कल राहें दिखलाता था मैं भी 
आज खुद खो जाया करता हूँ.…

बेखबरइस आपाधापी में
हर रोज कविता करता हूँ...  

रातों की काली स्याही को 
हर उजले दिन पर घिसता हूँ,
बेखबरइस आपाधापी में
हर रोज कविता करता हूँ , मैं हर रोज कविता करता हूँ ​


- कुमार ध्रुव 

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