Monday, July 5, 2010

छप छपा छप................


मुंबई और बारिश ...जितना कहे उतना कम है । बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है ।पर आज की बारिश की तो बात ही कुछ और थी। हम भीगते हुए अपने होस्टल को लौट रहे थे, अचानक बारिश तेज हो गयी , पेरों से वही छप छपा छप की आवाज़ आ रही थी और हम बस चले जा रहे थे |
हमारे यहाँ बारिश मुंबई जितनी तो नहीं होती पर जितनी भी होती है उसके हम खूब लुत्फ़ उठाया करते ।बात चाहे बारिश में नहाने की हो या गरमा गरम पकोड़ो की ,एक बारिश भी व्यर्थ ना जाया करती | गरम मूंगफली, भुट्टे या फिर मसालेदार चाय हर चीज़ का अपना एक अलग आनंद था |
हम स्कूल से जानबूच कर भीगते हुए घर आया करते थे | तेज़ साइकिल चलाने पर जब बारिश की बूंदे चेहरे से टकराती थी तो लगता था मानो हम किसी समंदर के किनारे खड़े हो| वो बात और है कि तब तक समंदर बस टी वी पर देखा था |हम अपनी पूरी पलटन के साथ एक के बाद एक सड़क के सारे गड्डो का पानी साइकिल के पहियों से चीरते चले जाते | सड़क पर बस हमारी साइकले ही लहराया करती थी| रास्ते में पानी से भरा एक गड्डा भी हमारी साइकिल के पहियों से अछूता ना रहता | लगता था मानो हम बादशाह और दुनिया गुलाम |
घर पहुचते तो भी बारिश का भूत सर से ना उतरता | हाथ में बाल्टी और तन पर बस चड्डी पहने हम निकल जाया करते पानी इकट्ठा करने के अपने अभियान पर , मानो जल संरक्षण की कोई नयी सरकारी योजना हो | ना लोगो की शर्म , ना सर्दी का डर| बस हम , हमारी बाल्टी और छत के नाले से गिरता पानी| तेज़ बारिश हो तो २-३ ड्रम आम बात थी| दादी आवाज़े लगे करती और हम मनमानी किया करते | इस तरह वो अपना धरम निभा लिया करती और हम अपना | परस्पर तालमेल का इससे बेहतर उदाहरण तो पूरे इतिहास में ना मिले |
पर अगर गलती से कहीं पिताजी दिन में दूकान से घर आ जाये तो हमारी खेर ना थी | नंगे बदन पर जब पड़ती थी तो बारिश में भी पसीने आ जाया करते थे | और ये समय होता था दादी की शिकायतों का , हमारी शरारतो का क्या खूब बदला लिया करती थी | पर दादी कि किस्मत इतनी अच्छी कहाँ , पिताजी तेज बारिश में दूकान से घर कम ही आया करते थे | गणित कि भाषा में कहे तो प्रोबबिलिटी शुन्य के बराबर ..............
अन्यथा हम अपना २-३ घंटो का आनंद कार्यक्रम तो दादी के हाथ के खाने के बाद ही संपन्न किया करते |शाम को छोटी बहिन स्कूल से आ जाती और उसके कुछ देर बाद ही माँ भी | फिर बनती थी गरमा गरम चाय और अगर किस्मत से माँ ज्यादा थकी ना हो और घर में सारे ताम झाम उपलब्ध हो तो माँ के हाथ के पकोड़ो के बिना शाम ना गुजरती | तब तक सामने वाले मैदान में कीचड़ खेल शुरू हो जाया करता , कबड्डी , खो-खो , सितोलिया और ना जाने क्या क्या , हर दिन एक नया खेल शुरू तो होता पर सबको कीचड़ में लथपथ किये बिना कोई खेल ख़त्म ना होता | बारिश थमते ही हम घर से निकलते और पानी में छप छपा छप करते हुए सीधे मैदान की ओर दौड़ लिया करते |
हम ये सब सोचते जा रहे थे और इधर बारिश और तेज़ होती जा रही थी | पर अब बात कुछ और थी, बारिश के साथ साथ हमारी चल भी तेज़ हो चुकी थी और आज फिर साथ चल रहे मित्रो कि परवाह किये बगेर हम बस दौड़ने लगे | वक़्त जैसे रुक सा गया था या सही शब्दों में कहे तो पीछे लौट रहा था और हम अब एक अलग दुनिया में थे | आई आई टी की सड़क पर बारिश में दौड़ना अपने आप में एक नया अनुभव था पर हमारे लिए तो कुछ भी नया ना था | सबकुछ शांत सा हो गया था और ठंडी हवा हमसे रफ़्तार मिला रही थी | सामने वाली सड़क मैदान लगने लगी थी और कुछ सुनाई दे रहा था तो बस वही बरसो पुरानी ' छप छपा छप'...'छप छपा छप'......................

4 comments:

ARVIND SONI SARTHAK said...

bahut khub

कुमार ध्रुव said...

thanks :)

meshuggeneh_moments said...

really nice! u took me back to childhood n also brought me bk wth a slap of reality!
excellent style of ritin! cherish it.. develop it.. :) (dont sell it :P)

Aadi said...
This comment has been removed by the author.