Wednesday, February 17, 2010

..........मैं तो छत पर आ जाया करती हूँ

......................मैं तो छत पर जाया करती हूँ | यहाँ से उस पेड़ को और पास से जाती हुई नदी को देखती रहती हूँ |कुछ दिनों बाद हमारी छत से वो नदी नहीं दिखेगी|माँ कहती है वो जो लम्बी मुछों वाले ठेकेदार है ना , वो घर के सामने एक बड़ी ईमारत बना रहे है |हमारे घर की छत छोटी है ना तो नदी नहीं दिखेगी |
आज मैं पास वाली रूपल दीदी की किताबे मांग लायी ,वो मैं तीसरी कक्षा में जो आ गयी हूँ |रूपल दीदी कहती है तीसरी की गणित दूसरी की गणित से कठिन है पर ये तो उन्होंने दूसरी की गणित के लिए भी कहा था जब में दूसरी में आई थी |इस बार में नया बस्ता नहीं खरीदूंगी ,माँ कहती है दूसरी का बस्ता ही ले जाया करना ,एक बटन टूटा है उस पर पिन लगा दूँगी |मैंने पूछा तो कहा की हर साल नए बसते नहीं खरीदते ,पर रमा और अशोक ने भी तो ख़रीदे है |मुझे सब पता है वो आजकल पिताजी के पास पैसे नहीं होते ना इसलिए |तभी तो आज फिर घर में रोटी तो बनी पर साथ में कोई सब्जी नहीं थी |

माँ कहती है, ये पहले नहीं होता था,वो पिताजी की नयी दुकान पर ज्यादा ग्राहक नहीं आते बस इसिलए |पिताजी आजकल चिंतित से रहते है और ज्यादा कुछ बोलते भी नहीं है |पहले दुकान से आकर माँ को आवाज़ लगाया करते थे |अब कुछ नहीं बोलते ,उल्टा माँ ही उनके आने से पहले चाय बना कर रखती है | पहले भी रखा करती थी पर पिताजी उन्हें आवाज़ तो लगाते ही थे |कभी ये कहने को कि चाय अच्छी बनी है या कभी ये कहने को कि आज शक्कर कम है | आजकल तो घर में शक्कर ही नहीं होती है | पुरानी दुकान काका कि हो गयी है ,पिताजी अब नयी दूकान पर बैठा करते है |पहले तो काका ,पापा हम सब साथ ही रहते थे सच में बड़े मज़े किया करते थे | माँ कहती है काका की शादी हो गयी है ना इसीलिए अब वे हमारे साथ नहीं रहते काकी के साथ रहते है और पुरानी दुकान अब काका की है |नयी दुकान ज्यादा चलती नहीं है |मैं यूही उन्हें देखने चली जाया करती हूँ पर वे कुछ सोचते ही रहते है ,अकेले बैठे बैठे |

आज पिताजी ने बड़ी जोर से डांट दिया|मै अब उनसे बात नहीं करुँगी, वैसे आजकल वो ही किसी से बात नहीं करते |पता नहीं शायद तबियत ठीक नहीं उनकी |माँ कहती है काका के अलग हो जाने से परेशान है|लेकिन सच मै तो काका ने ही हमे अलग कर दिया है |अब काका मुझे लेने के लिए पहले की तरह स्कूल नहीं आते आजकल मै अकेली आया करती हूँ |शायद काकी आ गयी है इसीलिए और दुकान का काम भी होता होगा |
मैं शाम को यहाँ छत पर आ जाया करती हूँ |घर में माँ पिताजी से रोज की तरह आज भी लड़ रही है |पर पिताजी हमेशा की तरह बस चुप है ,माँ के ताने सुनने की आदत हो गयी अब उन्हें | माँ मुझसे बड़ा प्यार करती है लेकिन दादा दादी से उतनी ही नफरत |पहले बहुत दुःख दिया उन्होंने माँ को शायद इसीलिए अब माँ उन्हें शाम समय प् खाना बना के नहीं देती |

मुझे दादा दादी बहुत अच्छे लगते है पर में कभी ज्यादा देर उनके पास नहीं ठहरती ,माँ को पसंद नहीं है |ये उन्हें भी पता है |ज्यादा देर रुको तो दादी माँ की बुराई करने लगती है |आजकल दादी को कम सुनाई देता है |मै अक्सर उनसे मजाक किया करती हूँ | लेकिन माँ तो हमेशा उन्हें काका काकी के पास भेजने को कहती रहती है ,पिताजी इस बात से बहुत गुस्सा होते है |माँ कहती है गर्मी के मौसम के बाद दादा दादी काका के घर रहेंगे |

पहले तो गर्मी के मौसम में काका केरियां लाया करते थे |अब शायद पिताजी ही लायेंगे |और नहीं भी लाये तो मैं तो उनसे नहीं मांगूंगी |कुछ दिनों पहले मेले में जाने की जिद की थी ,ऐसा डाटा मानो कोई चोरी की हो |अब मैं पिताजी से ज्यादा बात नहीं करती , और वे तो किसी से भी बात नहीं करते |हमेशा बस वही मौन चेहरा लिए घूमते है |माँ के ताने ख़त्म भी नहीं होते और उन्हें नींद आ जाती है |लेकिन मुझे पता है वे आजकल सोते नहीं है |नींद नहीं आती उन्हें ,हमेशा दुकान की चिंता लगी रहती है |पास वाले जग्गू सेठ की दुकान जो किराये से ली है |किराया देना है ,मेरी फीस |पिताजी कहते नहीं पर मुझे सब पता है, आज कल सब्जी जो नहीं होती रोटी के साथ |
माँ कहती है काका से अपना हिस्सा मांग लो और पिताजी ये सुनते ही घुमने के लिए बाहर चले जाते है |पिताजी कभी अपने छोटे भाई से कुछ नहीं मांग सकते, मुझे पता है |मैं भी राजू से नहीं मांगूंगी कुछ ,कभी नहीं |अभी कुछ ही दिनों पहले भुआ आई थी ,एक नयी साड़ी और सोने की अंगूठी लेके गयी ,उनके देवर की शादी जो है |पिताजी कभी माँ के लिए फूल भी नहीं लाये ,एक बार माँ जब उन्हें ताने दे रही थी तब मैंने सुना था |आजकल पिताजी के बारे में सबकुछ माँ के तानो से ही पता चलता है|
मैं
तो छत पर आ जाया करती हूँ | यहाँ से उस पेड़ को और पास से जाती हुई नदी को देखती रहती हूँ |कुछ दिनों बाद हमारी छत से वो नदी नहीं दिखेगी....

4 comments:

Pragya Maheshwari said...

bahut hi acha likha hai..
aise hi likhte raho

कुमार ध्रुव said...

koshish karunga.
aur agli bar thoda sankshipt me likhne ka prayas karunga

Unknown said...

no words to say..
you dragged me in my reminiscenes..
best in all..

Megha said...

Achcha likhte ho. Keep it up and write more frequently.. :)